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आज की तिथि - Aaj Ki Tithi

हिंदू पंचांग का हृदय कहा जाने वाला तिथि चंद्र मास का एक विशिष्ट दिन होता है। यही वह आधार है जिस पर हमारे सभी त्यौहार, व्रत, वार, महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथियाँ निर्धारित की जाती हैं। तिथि तब पूर्ण मानी जाती है जब चंद्रमा सूर्य से ठीक 12 डिग्री की दूरी पर पहुंच जाता है—यही क्षण नई तिथि का उदय कराता है। एक मास में कुल 30 तिथियाँ होती हैं।

 इनमें से पहली पंद्रह तिथियाँ शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के बढ़ते प्रकाश) में आती हैं और अगली पंद्रह तिथियाँ कृष्ण पक्ष (चंद्रमा के घटते प्रकाश) में गिनी जाती हैं। अमावस्या और पूर्णिमा हर महीने केवल एक बार आती हैं, जबकि बाकी तिथियाँ दो बार घटित होती हैं। तिथि के समापन का नियम सरल है—जब चंद्रमा सूर्य से अगले 12 डिग्री आगे बढ़ता है, नए दिन अर्थात नई तिथि की शुरुआत हो जाती है।

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आज की तिथि (Aaj Ki Tithi) | हिन्दू पंचांग और तिथियों का महत्व - विस्तृत जानकारी
1. प्रतिपदा नंदा (आनंद)

शुक्ल और कृष्ण पक्ष की पहली तिथि को प्रतिपदा कहा जाता है। इसे 'नंदा' तिथि की श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है आनंद प्रदान करने वाली। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन किसी भी नए कार्य, व्यापार या योजना का श्रीगणेश करना अत्यंत फलदायी होता है। हालाँकि, यह तिथि विवाह कार्यों के लिए मध्यम मानी जाती है, लेकिन गृह निर्माण, वास्तु शांति, और कृषि कार्यों के लिए यह सर्वोत्तम है। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को बलहीन माना जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा अत्यंत शुभ और ऊर्जावान होती है।

✦ स्वामी: अग्नि देव
2. द्वितीया भद्रा (कल्याण)

द्वितीया तिथि को 'भद्रा' संज्ञक माना गया है, जिसका अर्थ है कल्याणकारी। यह तिथि किसी भी कार्य की नींव रखने के लिए बहुत मजबूत मानी जाती है। यदि आप भवन निर्माण शुरू करना चाहते हैं, सरकारी नौकरी ज्वाइन करना चाहते हैं, या किसी स्थायी संपत्ति की खरीदारी करना चाहते हैं, तो द्वितीया तिथि अत्यंत शुभ है। यात्रा के लिए भी इसे अनुकूल माना जाता है। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक 'भाई दूज' इसी तिथि को मनाया जाता है, जो रिश्तों में मिठास और दीर्घायु का आशीर्वाद देता है।

✦ स्वामी: ब्रह्मा (विधाता)
3. तृतीया जया (विजय)

जैसा कि इसके वर्ग 'जया' से स्पष्ट है, तृतीया तिथि विजय और शक्ति की प्रतीक है। यदि आपको कोर्ट-कचहरी के मामलों, प्रतियोगिताओं या किसी संघर्ष में सफलता चाहिए, तो इस तिथि का चयन करें। यह तिथि कला, संगीत, चित्रकला और शिक्षा आरम्भ करने के लिए भी सर्वश्रेष्ठ है। अक्षय तृतीया, जिसे अबूझ मुहूर्त माना जाता है, इसी तिथि का सबसे शुभ रूप है। इस दिन अन्नप्राशन और मुंडन जैसे संस्कार करना बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

✦ स्वामी: गौरी (माता पार्वती)
4. चतुर्थी रिक्ता (खाली)

चतुर्थी तिथि को 'रिक्ता' श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है 'रिक्त' या खाली। इसलिए, इस दिन विवाह, गृह प्रवेश या किसी भी नए मांगलिक कार्य की शुरुआत करना वर्जित है, क्योंकि परिणाम शून्य हो सकते हैं। हालाँकि, यह तिथि शत्रु दमन, बाधाओं को हटाने, और कर्ज़ चुकाने के लिए अत्यंत शक्तिशाली है। चूँकि इसके स्वामी विघ्नहर्ता गणेश हैं, इसलिए इस दिन की गई गणेश पूजा और संकष्टी व्रत जीवन के सभी संकटों को हर लेते हैं। बिजली के उपकरण खरीदने या अग्नि संबंधी कार्यों के लिए भी यह तिथि उपयुक्त है।

✦ स्वामी: श्री गणेश
5. पंचमी पूर्णा (पूर्णता)

पंचमी तिथि 'पूर्णा' तिथि है, अर्थात यह कार्यों को पूर्णता प्रदान करती है। यह तिथि लक्ष्मी प्राप्ति और धन संचय के कार्यों के लिए विशेष शुभ मानी जाती है। यदि आप किसी रोग से मुक्ति चाहते हैं, तो इस दिन औषध सेवन आरम्भ करना लाभकारी होता है। यह तिथि विद्या अध्ययन, सरस्वती पूजा और विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए भी अनुकूल है। नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा से कालसर्प दोष और राहु-केतु की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

✦ स्वामी: नाग देवता
6. षष्ठी नंदा (आनंद)

षष्ठी तिथि पुनः 'नंदा' श्रेणी में आती है। यह तिथि विशेष रूप से शिल्प कला, वास्तुकला, और सौंदर्य प्रसाधनों के कार्यों के लिए शुभ है। नए वस्त्र और आभूषण धारण करने के लिए यह दिन उत्तम है। दक्षिण भारत में इस तिथि का विशेष महत्व है, जहाँ इसे स्कंद षष्ठी के रूप में मनाया जाता है। हालाँकि, कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दिन तेल मालिश और काष्ठ (लकड़ी) से जुड़े कार्यों से बचना चाहिए। यह तिथि संतान की दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए व्रत रखने हेतु श्रेष्ठ है।

✦ स्वामी: कार्तिकेय
7. सप्तमी भद्रा (कल्याण)

सप्तमी तिथि 'भद्रा' संज्ञक है और इसके स्वामी भगवान सूर्य हैं। यह स्वास्थ्य, आरोग्य और ऊर्जा की प्राप्ति के लिए एक शक्तिशाली तिथि है। यदि आप लंबी यात्रा पर जाने की योजना बना रहे हैं, तो सप्तमी तिथि का चयन करें, यह यात्रा को सुखद बनाती है। विवाह, संगीत, और वाहन खरीदने के लिए भी यह तिथि अत्यंत शुभ है। इस दिन सूर्य उपासना करने से नेत्र रोग और हड्डियों के रोगों में लाभ मिलता है। सरकारी कार्यों में सफलता के लिए भी सप्तमी का दिन चुना जा सकता है।

✦ स्वामी: सूर्य देव
8. अष्टमी जया (विजय)

अष्टमी तिथि 'जया' श्रेणी की एक अत्यंत प्रभावशाली तिथि है। यह शक्ति उपासना और विजय का दिन है। दुर्गा अष्टमी और जन्माष्टमी जैसे बड़े पर्व इसी तिथि को मनाए जाते हैं। यदि आप किसी प्रतियोगिता, वाद-विवाद या खेलकूद में भाग ले रहे हैं, तो यह दिन आपको विजय दिला सकता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह तिथि बहुत ऊर्जावान है, लेकिन विवाह जैसे कोमल कार्यों के लिए इसे अक्सर टाला जाता है क्योंकि इसमें उग्र ऊर्जा की प्रधानता होती है। रत्न धारण करने के लिए यह दिन शुभ है।

✦ स्वामी: भगवान शिव / रुद्र
9. नवमी रिक्ता (खाली)

नवमी तिथि 'रिक्ता' संज्ञक है, जिसका अर्थ है कि इस दिन किए गए शुभ कार्यों का फल प्राप्त होने में कठिनाई होती है। इसलिए विवाह, सगाई या गृह प्रवेश के लिए यह तिथि पूर्णतः वर्जित है। हालाँकि, यह तिथि विध्वंसक कार्यों, जैसे शत्रु पर आक्रमण, शिकार, या पुरानी इमारतों को गिराने के लिए उपयुक्त है। धार्मिक दृष्टि से यह तिथि अत्यंत पवित्र है क्योंकि भगवान राम का जन्म (राम नवमी) और महानवमी (दुर्गा पूजा) इसी दिन होती है। अतः, यह दिन भौतिक कार्यों के बजाय आध्यात्मिक साधना के लिए श्रेष्ठ है।

✦ स्वामी: माँ दुर्गा
10. दशमी पूर्णा (पूर्णता)

दशमी तिथि 'पूर्णा' है, जो कार्यों में परिपूर्णता और सफलता लाती है। यह तिथि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए उत्तम है। गृह प्रवेश, विवाह, नया वाहन खरीदना, और पदभार ग्रहण करने के लिए दशमी तिथि सर्वश्रेष्ठ मुहूर्तों में से एक है। विजयादशमी (दशहरा) इस तिथि का सबसे बड़ा उदाहरण है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन शुरू किया गया कोई भी कार्य असफल नहीं होता। यह तिथि मान-सम्मान और यश की वृद्धि करती है।

✦ स्वामी: यमराज
11. एकादशी नंदा (आनंद)

एकादशी तिथि हिन्दू धर्म में सबसे पवित्र तिथियों में से एक मानी जाती है। इसे 'नंदा' तिथि कहा जाता है। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी, इस दिन उपवास रखने से शरीर और मन का शुद्धिकरण होता है और पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है। धार्मिक अनुष्ठान, कथा, कीर्तन और देव कार्यों के लिए यह दिन सर्वश्रेष्ठ है। हालाँकि, एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना जाता है। इस दिन विवाह और निर्माण कार्य भी शुभ माने जाते हैं, परन्तु मुख्य फोकस आत्म-शुद्धि पर रहता है।

✦ स्वामी: विश्वेदेव
12. द्वादशी भद्रा (कल्याण)

द्वादशी तिथि 'भद्रा' संज्ञक है और इसके स्वामी भगवान विष्णु हैं। यह तिथि एकादशी व्रत के पारण के लिए जानी जाती है। यह दिन यज्ञ, हवन, और बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए अत्यंत शुभ है। इस दिन दान-पुण्य करने से अक्षय फलों की प्राप्ति होती है। नया घर बसाने, विवाह करने और लंबी यात्राओं के लिए यह तिथि अनुकूल है। यह तिथि स्थिरता प्रदान करती है, इसलिए शपथ ग्रहण या पदभार संभालने जैसे कार्यों के लिए भी इसका चयन किया जाता है।

✦ स्वामी: भगवान विष्णु
13. त्रयोदशी जया (विजय)

त्रयोदशी तिथि 'जया' श्रेणी की है और भगवान कामदेव इसके स्वामी माने जाते हैं (कुछ मतों में शिव)। यह तिथि प्रदोष व्रत के लिए प्रसिद्ध है, जो भगवान शिव को समर्पित है। आरोग्य प्राप्ति, रोगों के नाश और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए यह तिथि अमोघ है। इस दिन नई औषधियों का निर्माण और सेवन लाभकारी होता है। यह तिथि सांसारिक सुख-सुविधाओं, वस्त्र-आभूषण खरीदने और यात्रा के लिए भी बहुत शुभ मानी जाती है। सायंकाल की शिव पूजा इस दिन विशेष फलदायी होती है।

✦ स्वामी: कामदेव
14. चतुर्दशी रिक्ता (खाली)

चतुर्दशी तिथि 'रिक्ता' श्रेणी में आती है, इसलिए इसे क्रूर तिथि माना जाता है। इस दिन विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य पूरी तरह से वर्जित हैं। यह तिथि उग्र कार्यों, तंत्र-मंत्र साधना, और प्रेत बाधाओं के निवारण के लिए उपयुक्त है। मासिक शिवरात्रि इसी तिथि को होती है, इसलिए यह आध्यात्मिक साधना और ध्यान के लिए बहुत शक्तिशाली दिन है। भगवान शिव की विशेष कृपा पाने के लिए इस दिन जलाभिषेक करना चाहिए। इस दिन यात्रा करने से कष्ट हो सकता है।

✦ स्वामी: भगवान शिव
15. पूर्णिमा (शुक्ल) पूर्णता का प्रतीक

शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि पूर्णिमा कहलाती है, जब चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ चमकता है। यह तिथि अत्यंत पवित्र और ऊर्जावान मानी जाती है। सत्यनारायण की कथा, यज्ञ, और किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्यों (विवाह, नामकरण, गृह प्रवेश) के लिए यह सर्वश्रेष्ठ दिन है। इस दिन चंद्रमा का प्रभाव जल और मन पर सर्वाधिक होता है, इसलिए ध्यान और मानसिक शांति के उपाय इस दिन शीघ्र फल देते हैं। पूर्णिमा को किया गया दान और पूजा परिवार में समृद्धि लाती है।

✦ स्वामी: चंद्र देव
30. अमावस्या (कृष्ण) पितृ कार्य हेतु

कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या कहलाती है, जब आकाश में चंद्रमा अदृश्य रहता है। यह तिथि पितृ कार्यों, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए समर्पित है। इस दिन किसी भी नए शुभ कार्य (जैसे विवाह या गृह प्रवेश) की शुरुआत करना अशुभ माना जाता है, क्योंकि इसमें 'सोम' (अमृत) की अनुपस्थिति होती है। हालाँकि, यह तांत्रिक साधनाओं, ध्यान और दान-पुण्य के लिए अत्यंत शक्तिशाली तिथि है। दीपावली जैसा महान पर्व भी इसी तिथि को मनाया जाता है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है।

✦ स्वामी: पितृ देव
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